वास्तुशिल्प

यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य है कि पतित पावनि गंगा नदी, जिसका पवित्र पानी सारे पाप धो देने की मान्यता रखता है, इस प्रदेश से गुज़रती है। यह क्षेत्र प्राचीन इंडो-आर्यन सभ्यता का भी साक्षी है। इसी सभ्यता ने प्राचीन भारत देश को कई शक्तिशाली राज्य और शासक दिए। मसलन हिंदू, इस्लामिक, बौद्ध और यूरोपियन शासकों का यहां एक लंबा इतिहास रहा है। इन सभी शासकों का प्रभाव यहां पर पड़ा और उसके आधार पर इस क्षेत्र का सांस्कृतिक विकास हुआ। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की वास्तुकला विरासत पर इनका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

यहां की स्मारकों और ऐतिहासिक इमारतों में बौद्ध, हिंदू, इंडो-इस्लामिक और इंडो-यूरोपियन वास्तुकला की छाप दृष्टिगोचर होती है। इस कारण यहां आने वाले पर्यटक वास्तुकला के क्रमिक विकास को समझ सकते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि समृद्ध वास्तुकला विरासत को समझने के लिए इससे बेहतर प्रदेश और कोई नहीं हो सकता।

वास्तुकला के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश के स्मारकों में शामिल हैं बौद्ध स्तूप और विहार, प्राचीन मठ, शहर, किले, विशालकाय दरवाज़े, महल, मंदिर, मस्जिद, मकबरें, स्मारक और अन्य सामुदायिक भवन। भारत के यह अद्भुत नमूने आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, झांसी, मथुरा, कानपुर, मेरठ और मिर्जापुर जैसे शहरों के शिक्ति के केंद्र, शिक्षण संस्थानों और तीर्थ स्थानों पर निर्मित किए गए हैं, जो किन्ही न किन्ही कारणों से खुद में एक आकर्षण का केंद्र हैं।

मुगलिया वास्तुकला में हिंदू, इस्लामिक और मध्य एशियाई संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है। यूपी में स्थित इस्लामिक इमारतों को वैश्विक ख्याति हासिल है। उस दौर की तीन इमारतों को यूनेस्को ने विश्व संरक्षित क्षेत्र घोषित किया हुआ है। यह इमारतें हैं ताज महल, आगरा का किला और बादशाह अकबर के ख्वाबों की राजधानी फतेहपुर सीकरी।

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अंतिम संपादन तिथि : सोमवार, Jan 23 2017 3:12PM