कला और शिल्प

उत्तर प्रदेश में प्राचीन काल से चित्रकारी, शिल्पकला के अलावा धातुओं, लकड़ी, हाथीदांत, पत्थर और मिट्टी पर दस्तकारी की कला लोकप्रिय रही है। समय के साथ-साथ इसमें नई तकनीकियों और शैलियों का भी साथ जुड़ता गया।

चित्रकारी और भित्ति चित्र

उत्तर प्रदेश में चित्रकारी की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से चलती चली आ रही है। सोनभद्र और चित्रकूट में मिली गुफाओं की दीवारों पर शिकार, युद्ध, त्योहार, नृत्य-संगीत, श्रृंगार रस और जानवरों के उकेरे हुए चित्र मिले थें। वैसे यूपी में चित्रकारी का स्वर्णिम काल मुग़ल दौर कहा जा सकता है, खासकर जहांगीर के शासन काल में चित्रकारी की कला ने नए आयाम छुएं। यही वजह है कि मुग़ल शैली की चित्रकारी एशियाई संस्कृति की खास उपलब्धि मानी जाती है। विचार, प्रस्तुति और स्टाइल में इस शैली का कोई जोड़ नहीं है।

मथुरा में ओरछा के राजा ने जब केशव देव मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, तो उस वक़्त बुंदेलखंड क्षेत्र में चित्रकारी बतौर कला अपने शिखर और पूर्णता पर थी। मथुरा, गोकुल, वृंदावन और गोवर्धन में चित्रकारी के जरिए भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़े प्रसंगों को जीवंत किया गया है। चित्रकारी के आधुनिक दौर से पहले एक और शैली अस्तित्व में आई, जिसे गढ़वाली कला का नाम दिया गया। इस शैली को गढ़वाल के राजा ने न सिर्फ प्रश्रय दिया, बल्कि फलने-फूलने के तमाम अवसर भी उपलब्ध कराएं।

शिल्प

उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती है चिकनकारी। हाथ से बेहद बारीक और खूबसूरत कढ़ाई को चिकनकारी कहते हैं। यह मूलतः लखनऊ की कला है, जिसकी ख्याति आज सात समंदर पार तक है। मूलतः यह शिफॉन, मलमल, ऑर्गॅज़ा, ओरगंडी और रेशम पर की जाती है। गर्मी के मौसम में चिकन के कुर्ते और साड़ी बेहद आरामदायक मानी जाती है।

ज़रदोज़ी एक ऐसी कला है जिसमें कढ़ाई त्रि-आयामी की जाती है। वाराणसी का जरी का काम दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तन और धातुओं के उत्पाद भी बड़े पैमाने पर बनते हैं।

हाथ से बुनी गई कालीन उत्तर प्रदेश की एक और सांस्कृतिक और कलात्मक पहचान है। देश के कुल कालीन उत्पादन में 90 फीसदी हिस्सा यूपी के कालीन उद्योग का है। राज्य में मिर्ज़ापुर, खमरिया और भदोही कालीन निर्माण के प्रमुख केंद्र हैं।

धातु का सामान

उत्तर प्रदेश, देश में पीतल और तांबा के सामान बनाने का सबसे बड़ा केंद्र है। लगभग प्रत्येक घर में तांबे का लोटा देखने को मिल ही जाएगा। इसका इस्तेमाल रोज़मर्रा के कामों में होता है। लोटे की विविध किस्में होती हैं जिन्हें इटावा, बनारस और सीतापुर के लोटे के तौर पर जाना जाता है। पूजा-पाठ के सिलसिले में तांबे के सामान का इस्तेमाल किया जाता है। मुरादाबाद पीतल के कलात्मक काम के लिए खासा प्रसिद्ध है। पीतल के बर्तन और सजावटी सामान के अलावा मीनाकारी और नक्काशी के लिए मुरादाबाद देश समेत दुनिया भर में जाना जाता है।

मिट्टी के बर्तन

यूपी के खुर्जा, चुनार और रामपुर चीनी-मिट्टी के बर्तनों के लिए भी जाने जाते हैं। सफेद बैक ग्राउंड पर नीली-हरी डिज़ाइन वाले ग्लेज़ बर्तन चीनी-मिट्टी के बर्तन कहे जाते हैं। चुनार काली मिट्टी के बर्तन के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसमें डिज़ाइन को उकेरने के लिए सिल्वर पेंट की मदद ली जाती है। खुर्जा सस्ते और टिकाऊ खाने के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है। चावल के खेतों की मिट्टी से बनने वाले पाउडर काबीज से बने बर्तनों के लिए निज़ामाबाद का एक अलग स्थान है।

टेराकोटा

गोरखपुर में कुछ गांव ऐसे हैं जहां जानवरों की मिट्टी से आकृतियां गढ़ी जाती हैं। खासकर सजे-धजे टेराकोटा घोड़े न सिर्फ इन इलाकों की पहचान हैं, बल्कि दुनिया में भी इन्होंने अपनी कला के झंडे गाड़े हैं। कुम्हार चाक पर अलग-अलग हिस्सों को आकार देने के बाद में उन्हें जोड़ कर एक आकृति तैयार करता है।

आभूषण

लखनऊ चिकनकारी के अलावा अपने आभूषणों और मीनाकारी के काम के लिए भी जाना जाता है। खासकर चांदी के बर्तनों पर सांप, शिकार के दृश्य और गुलाब के फूलों की डिज़ाइन बेहद लोकप्रिय है। यहां का बिदरी और ज़रबुलंद चांदी का काम तो हुक़्क़ा फर्शी, ज्वेल बॉक्सेस, ट्रे, कटोरे, कफलिंक, सिगरेट होल्डर्स आदि की पहचान बन चुका है। हाथी दांत और हड्डियों पर बेल-बूटे, जीव-जंतु और अन्य डिज़ाइन भी यहां कि एक प्रमुख खासियत है। इसके अलावा चाकू-छुरी, लैंप शेड्स, छोटे खिलौने और शर्ट पिन भी दस्तकारी के प्रमुख उत्पाद हैं, जिनसे लखनऊ की पहचान है।

इत्र

इत्र या परफ्यूम भी लखनऊ में 19वीं सदी से बनाए जा रहे हैं। लखनवी 'इत्र' को बनाने से पहले काफी प्रयोग और शोध किये जाते हैं, तब कहीं जाकर कई-कई दिनों तक न मिटने वाली खुशबू तैयार होती है। विभिन्न तरह के इत्र बनाने के लिए खुश्बूदार जड़ी-बूटियां, मसाले, चंदन का तेल, कस्तूरी, फूलों के सत्त और कई तरह की पत्तियों की मदद ली जाती है। खस, केवड़ा, चमेली, ज़ाफ़रान और आगर कुछ बेहद लोकप्रिय खुशबू हैं।

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अंतिम नवीनीकृत तिथि : सोमवार, Jan 23 2017 1:15PM