खान-पान व व्यंजन

उत्तर प्रदेश स्वाद के मामले में भी बेहद समृद्ध विरासत का धनी है। यहां परंपरागत खान-पान से लेकर आधुनिक व्यंजनों की विभिन्नता उपलब्ध है। कह सकते हैं कि यूपी का खान-पान इसके सांस्कृतिक विस्तार का  एक  पहलू है ।

अवध के शाही मुगलई व्यंजनों से लेकर मथुरा-वृंदावन इलाके के विशुद्ध शाकाहारी व्यंजन, तो रामपुर की रसोई से पसंदा, तो मुंह में जाते ही घुल जाने वाला बनारसी पान.… सब लाजवाब हैं। और तो और, प्रदेश के विभिन्न शहरों में मिलने वाले स्ट्रीट फ़ूड से लेकर आगरा के पेठे तक.... यूपी में इतनी विविधता है कि वह हर किसी के स्वाद के अनुरूप संतुष्टि देने में सक्षम है। यह अलग बात है कि स्वाद में इतनी विभिन्नता के कारण यहां का स्वाद लेने वाले पूरी तरह से तृप्त नहीं हो पाते।

बनारसी खान-पान

बनारस प्राचीनकाल से सुशिक्षित और सुसंस्कृत लोगों का गढ़ रहा है। संभवतः इसी कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसका स्वाद सबसे अलग और अनूठा ही रहा है। शुद्धता, सादगी और अनूठी परंपरा इसके स्वाद को औरों से अलग रखती है। मिठाइयां बनारस का हमेशा से विशेषज्ञता का अधिकार क्षेत्र रहा है।

हालांकि कचौड़ी, जलेबी, समोसा और स्ट्रीट फ़ूड की विविधता जिनमे स्थानीय चाटवाले तक के व्यंजन शामिल हैं, यहां आने वाले पर्यटकों का दिल जीतने में कामयाब रहते हैं।

अवधी खान-पान

नवाबी संस्कृति के केंद्र अवध ने हर स्वाद को अपनाया। खासकर अच्छे खान-पान के शौकीन नवाबों और अन्य शाही वंशजों ने शानदार और तृप्त करने वाले खाद्य पदार्थों की परंपरा का हमेशा पालन किया। व्यंजनों की गुणवत्ता बरकरार रख कुछ नया तैयार करते हुए पुराने स्वाद को कायम रखना एक बड़ी चुनौती होती थी, जिसमें काफी समय खर्च होता था। लेकिन, इसने नवाबों के दस्तरखान को पूरे भारतवर्ष में सबसे आकर्षक और स्वादिष्ट बनाए रखने में महती भूमिका निभायी। अवधी पाककला विरासत न सिर्फ दस्तरखान को सजाने बल्कि बावर्चियों के अनुभव और व्यंजनों को पकाने की उनकी विशिष्ट शैली के लिए भी प्रसिद्ध है। इसमें और चार चांद लगाने का काम किया रकाबदारों ने। रकाबदार मसाले के विशेषज्ञों को कहते थे।  किस व्यंजन में कौन सा मसाला पड़ेगा और कितनी मात्रा में, इसकी पूरी ज़िम्मेदारी इन्हीं की होती थी। सही अर्थों में देखा जाए तो रकाबदार ही बावर्चीखाने के असली कर्ता-धर्ता हुआ करते थे।

मिठाइयां

मीठे के शौकीनों के लिए मथुरा की खुरचन और मुंह में जाते ही घुल जाने वाले पेड़े या तो आगरा के पेठे तो देश छोड़िए सात समंदर पार स्वाद के शौकीनों तक जा पहुंचे हैं। लखनऊ के शाही टुकड़े और वाराणसी की मलइयो, जिसे लखनऊ में मलाई मक्खन या निमिष के नाम से पुकारते हैं जीभ समेत आत्मा तक को मिठास से भर देते हैं।

मुगलई व्यंजन

मुगलई व्यंजनों की लंबी फेहरिस्त वास्तव में नवाबों और उनके बावर्चियों की देन है। यही वजह है कि मुगलई खान-पान उत्तर प्रदेश की अमिट पहचान बन चुका है। अपने उत्कृष्ट स्वाद के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध कुछ खास मुगलई व्यंजन ये हैं :

कुंदन कलिया

कलिया मटन से तैयार होने वाली डिश है, जिसमें हल्दी या केसर डालना अनिवार्य है। नवाबी बावर्चियों ने इसके स्वाद में भी विविधता लाने का काम किया। मसलन माही कलिया, चांदी कलिया और स्वाद में लाज़वाब कुंदन कलिया। रकाबदारों और बावर्चियों ने कुंदन कलिया क़िस्म खासतौर से नवाबों को खुश करने के लिए तैयार की थी। इसमें स्वर्ण भस्म का इस्तेमाल इसे सही मायनो में शाही स्वाद प्रदान करता है।

शामी कबाब

यह एक मांसाहारी व्यंजन है जो मटन कीमा से तैयार होता है। आकार में गोल कबाब को स्वाद देने का काम करते हैं विभिन्न मसाले, जिन्हें कीमा के साथ अच्छे से मिलाया जाता है। बेहद मुलायम कबाब की सभी किस्मे मुंह में जाते ही घुल जाती हैं।

काकोरी कबाब

अवध क्षेत्र में सींक कबाब को पेश करने का श्रेय भी मुगलों को जाता है। पहले पहल अन्य मांस से तैयार कीमा को मसालों से लपेटकर एक लोहे की सींक में पिरो कर कोयले की आंच पर पका परोसा जाता था। हालांकि बाद में भारतवर्ष में गो-पूजा को देखते हुए इसमें प्रयोग किए गए और मटन कीमा का इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे ये नर्म भी हुए और स्वाद भी बढ़ा।

अब बात करते हैं काकोरी कबाब की। लखनऊ की शहर सीमा से बाहर पड़ता है काकोरी नाम का स्थान। ये इलाका लखनऊ-मलिहाबाद आम क्षेत्र में भी आता है। ब्रितानी हुकूमत के दौरान एक परंपरा सी चल पड़ी थी कि स्थानीय राजा और नवाब वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारियों का स्वागत-सत्कार करते थे। आम के मौसम में 'मैंगो डिनर' की शुरुआत उसी परंपरा की देन है। आम के बगीचों में ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष फलों के राजा आम की विभिन्न प्रजातियां शान-ओ-शौकत से परोसी जाती थीं। काकोरी में ऐसी ही एक पार्टी में एक ब्रितानी अधिकारी ने सींक कबाब में मांस के टुकड़ों के महीन ना होने पर टिप्पणी कर दी। यह बात मेजबान और तत्कालीन नवाब सय्यद मोहम्मद हैदर काज़मी को अखर गई। उन्होंने अगले ही दिन अपने रकाबदारों और बावर्चियों को बुला भेजा और आदेश दिया कि सींक कवाब की और महीन क़िस्म तैयार की जाए। दस दिन की रिसर्च और तमाम प्रयोगों के बाद काकोरी कबाब की क़िस्म सामने आई। इसके बाद नवाब साहेब ने उसी ब्रितानी अधिकारी को फिर से निमंत्रण भेजा और कबाब की वह नई क़िस्म परोसी। जाहिर सी बात है कि इस बार उसके मुंह से सिर्फ तारीफ ही निकली। उसके बाद से काकोरी कबाब की धूम जगजाहिर है। हालांकि अब इन्हें और जगहों पर भी बनाया जाता है लेकिन नाम वही है काकोरी कबाब। इसकी वजह यही है कि इसे बनाने का तरीका और स्वाद काकोरी में नवाब साहेब द्वारा तैयार विधि जैसा ही है।

गुलनार कबाब

स्वाद के शौकीनों के बीच गुलनार कबाब भी खासी अहमियत रखते हैं। मुर्गे के गोश्त में मसालों और टमाटर के बेहतर संयोजन से तैयार होती है यह डिश। इसे गुलाब की पंखुड़ियों से सजा कर परोसा जाता है। यह अवध के बावर्चियों द्वारा तैयार की गई बेहद खास डिश है।

निहारी खास

निहारी सरसों के तेल में बनाई जाती है। यह हर आम-ओ-खास की पसंद है। निहारी शब्द नेहार यानि निरा-हार या सरल शब्दों में कहें तो व्रत से आया है। मुस्लिमों में नाश्ते के लिए यह खासा लोकप्रिय व्यंजन है। पहले पहल इस व्यंजन के लिए भी अन्य मांस का ही इस्तेमाल होता था, लेकिन बाद में मटन का प्रयोग होने लगा। इसमें मटन को भाप में रात भर पकाया जाता है फिर सुबह इसे मसालों संग अच्छे से पका कुलचे साथ परोसा जाता है। इसके संदर्भ में एक रोचक बात यह है कि यह व्यंजन भी हकीमी नुस्खों की देन है। इसे जाड़ों के मौसम में शरीर को गर्म रखने के लिए खाया जाता है।

नरगिसी कोफ्ते

अवधी खान-पान की एक बेहद अच्छी बात यह है कि यहाँ स्वाद का उसके अंजाम तक पहुंचाने और व्यंजनों को स्वादिष्ट बनाने के लिए अन्य स्रोतों से भी प्रेरणा लेने से गुरेज़ नहीं किया। मसलन मौसम, तीज-त्योहार। यहां तक कि रंगों और कविताओं से भी प्रेरणा ली। नरगिसी कोफ्ते वास्तव में उबले अंडे से बनने वाली डिश है। इसमें अंडे को कीमे में लपेट कर डीप फ्राई करते हैं। पकने के बाद इसे जब बीच से काटा जाता है तो यह आंख की तरह दिखती है। खान-पान के शौक़ीन और बेहतर स्वाद देने के लिए अंडों के आकार तक पर गौर करते हैं। ऐसे लोग गोल अंडे के बजाय पतले अंडों को तरजीह देते हैं ताकि इसका आकार और भी सटीक बैठे!

पतीली कबाब

अवध क्षेत्र को अगर तरह-तरह के कबाबों की जननी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। अलग-अलग आकार के आलावा इनमें मांस का प्रयोग भी विभिन्न तरीके से होता है। साथ ही इन्हें पकाने का अंदाज़ भी जुदा रहता है। आमतौर पर ऐसी मान्यता है कि कबाब कोयले की आंच पर सींक के जरिये सेकें जाते है या इन्हें तवे पर हलकी चिकनाई में सेंका जाता है, लेकिन ऐसा है नहीं। कुछ इलाकों में कबाब को पीतल या कांसे की गहरी पतीली में भी बनाया जाता है। इस तरह बनने वाले कबाब को अलग-अलग टुकड़ों में परोसने के बजाय एक समग्र रूप में परोसा जाता है। इसे धीमी आंच पर घी और मसालों के साथ पकाते हैं। इस तरह मसालों की खुशबू इनमें बस जाती है और धीमी आंच इन्हें नरम बनाए रखती है। इसका आनंद भी अनूठा ही है!

पसंदा कबाब

इसकी तो तैयारी ही देख कर मुंह में पानी आ जाता है। यह लगभग दो इंच वर्गाकार बोनलेस मांस का टुकड़ा होता है। इसे चाकू की भोथरी धार की तरफ से कूट-कूट कर और पतला बनाते हैं। फिर इसे कोयले की आंच पर ग्रिल पर या बर्तन में घी में पकाते हैं। लखनऊ में इसे ज्यादातर बर्तन में ही पकाया जाता है।

शब देग

लगभग 200 साल पहले 18वीं सदी में कश्मीरी परिवार घाटी से निकल मैदानी इलाकों में रहने आए। इनका मकसद नाम और दाम कमाने का था। यह वह दौर था जब मुगल साम्राज्य उतार पर था। इसके बावजूद अवध की ख्याति इन कश्मीरी परिवारों को यहां तक खींच लाई। कई कश्मीरी परिवार लखनऊ में भी बस गए। ये लोग अपने साथ केसर, कहवा और स्वादिष्ट कश्मीरी पाक कला भी लेकर आए थे। इन्होंने जाड़े के मौसम में अवध के नवाबों के लिए शब देग का स्वाद पेश किया। यह स्वाद सिर्फ जाड़ों के स्वागत का ही अंदाज़ नहीं था, बल्कि धरती के स्वर्ग यानी कश्मीर का ज़मीन (मैदानी इलाकों ) से मिलन भी था।

शब देग यानि साबुत शलजम, कश्मीरी बेर, मटन बॉल (कोफ्ते) और तमाम मसालों का बेहतरीन मिश्रण है। इसे शब यानी रात को पकाते हैं। शलजम संग केसर का मिलन, खास कश्मीरी बेर और कश्मीरी प्याज से जो स्वाद पैदा हुआ उसका कोई जोड़ नहीं है। इसे लज़्ज़त और जायका देने का काम करती है देग, जिसमें सारी सामग्री को बेहद धीमी आंच पर रात भर पकाया जाता है। खास बात यह है कि देग का मुंह आटे की लोई से बंद कर दिया जाता है। इस तरह मसालों की खुशबू मांस में रच-बस जाती है।

ज़मीं दोज़

मछली पकाने की एक पुरानी विधि, जिससे तैयार व्यंजन को ज़मीं दोज़ मछली का नाम दिया गया। इसमें एक साबुत मछली को साफ कर भीतर मसाले भर देते हैं। फिर इसे मिट्टी के बर्तन में रख उसका मुंह बंद कर जमीन में गाड़ देते हैं। जमीन के ऊपर से कंडों की आंच से इसे पकाते हैं। इसे पकने में लगभग 6 से 8 घंटे तक लगते हैं। हालांकि इस स्वाद के लिए इतना इंतजार बेकार नहीं जाता है। प्राचीन काल में कुम्हार इसके लिए खास मिट्टी के बर्तन गढ़ते थे। यह बर्तन मछली के आकार पर निर्भर करते थे यानि इतने बड़े होते थे कि उनमें मछली न सिर्फ आ जाए बल्कि अच्छे से पक भी जाए। यह मछली जब पक कर तैयार होती तो इसमें मिट्टी की सौंधी महक भी होती थी। यह उस ज़माने की बात है जब इस विधि से मछली पकाने के लिए खास बर्तन ढूंढा जाता था। अब तो आसानी से घर में उपलब्ध रोटी रखने के बर्तन या दही ज़माने वाले मिटटी के बर्तन से ही काम चला लिया जाता है।

लखनवी बिरयानी

यह अजीब किन्तु बेहद रोचक बात है कि अवधी व्यंजनों में बिरयानी खास खाने के मेन्यू में शामिल नहीं है। इसे तब और आज भी अनौपचारिक व्यंजन बतौर ही खाया जाता है। बिरयानी पकाने का सबसे प्रचलित तरीका दम पुख्त है। इसमें चावल पकाने का खास अवधी तरीका ही इस्तेमाल में लाया जाता है। बिरयानी का शाब्दिक अर्थ होता है भुना या तला हुआ। इसे बनाने की तैयारी में चावल को मटन के पानी में पकाने से पहले हल्का सा भून लिया जाता है। इस तरह यह नाम पड़ा है। गौरतलब है कि पुलाव बनाने में चावल को उबाला जाता है फिर अन्य सामग्रियों के साथ पकाते हैं।

ज़र्दा

कला के कद्रदान नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने में उत्सव भी खास अंदाज़ में बेहद भव्य तरीके से मनाए जाते थे। उन दिनों बसंत के मौसम में गोमती नदी में बजरे निकालने की परंपरा थी। बसंत के मौसम से मेल खाते पीले रंग की पोशाक में सजे-संवरे स्त्री-पुरुष इन बजरों पर राग वसंत पर नृत्य पेश करते थे। उनकी इस अद्भुत पेशकश से गोमती नदी पीले रंग में लिपटी सी नजर आती थी। बसंत के मौसम को ही मनाने का एक अंदाज़ है ज़र्दा। इसे अब भी शादी या अन्य ख़ुशी या धार्मिक आयोजनों पर पकाते हैं। वैसे भी मीठा शगुन माना जाता है तो मीठे चावल यानि ज़र्दा से शुभता का स्वागत करना क्या बुरा है!

रूमाली रोटी

आकार में रूमाल या स्कार्फ की तरह दिखने के कारण इसे यह नाम दिया गया। इसकी खास बात यह है कि इसे बेलन से चकले पर नहीं बेला जाता है, बल्कि इसे हाथ से यह आकार दिया जाता है। फिर इसे लोहे के उभरे या दुसरे शब्दों में उलटे तसलेनुमा बर्तन पर सेंका जाता है। अवध के खान-पान में इस रोटी का एक खास स्थान है। बेहद पतली और नरम होने के कारण कबाब या कोरमे के साथ यह बेहतरीन जायका देती है।

शीरमाल

लखनऊ में शीरमाल की खोज प्रतिष्ठित ब्रेड मेकर मुहम्मदन ने की। इसे बनाने से पहले आटे में दूध, चिकनाई और केसर मिला कर खमीर से उठाया जाता है। परंपरागत तौर पर इसे लोहे के तंदूर में पकाते हैं। इसे ढक्कन से ढक कर तवे पर भी पका सकते हैं। इस विधि में इसे ऊपर और नीचे से आंच पहुंचा कर पकाया जाता है।

कुलचा

इसे ज़्यादातर निहारी संग खाया जाता है। मुलायम होने के कारण इसे अन्य शोरबे (करी) वाले व्यंजनों संग भी खाते हैं।

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अंतिम नवीनीकृत तिथि : शनिवार, Jan 14 2017 12:36PM